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वरुण गांधी को BJP पार्टी से जाने वाले है?

उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव होने में अब कुछ ही महीने बचे हैं और गांधी परिवार एक बार फिर किसानों के समर्थन में मैदान में उतर आया है. लेकिन इस बार राहुल गांधी या प्रियंका गांधी नहीं बल्कि उनके चचेरे भाई और भारतीय जनता पार्टी के सांसद वरुण गांधी किसानों के अधिकारों की बात कर रहे हैं. पिछले कुछ दिनों से वरुण गांधी के तेवर और तेवर कुछ अलग ही नजर आ रहे हैं.

पहले उन्होंने राजनीति से प्रेरित किसान नेताओं को अपने शरीर का अंग बताया और मांग की कि सरकार उनसे बात करे। और अब वरुण गांधी ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को एक पत्र भेजा है, जिसमें उन्होंने किसानों के समर्थन में मांगों की एक लंबी सूची उनके सामने रखी है, वह भी, जिसके बारे में किसान नेताओं ने शायद सोचा भी नहीं था. जैसे डीजल पर 20 रुपये प्रति लीटर की सब्सिडी देने की मांग।

सवाल यह नहीं है कि वरुण गांधी की मांग जायज है या नहीं। सवाल यह है कि सत्ताधारी पार्टी के सांसद का सार्वजनिक रूप से सरकार और पार्टी के खिलाफ जाना कितना उचित है। बेशक गांधी-नेहरू परिवार का खून वरुण गांधी की रगों में दौड़ रहा है, लेकिन वरुण और उनकी मां मेनका गांधी स्वेच्छा से बीजेपी में शामिल हुए थे. भाजपा ने भी दोनों को उचित सम्मान और सम्मान दिया था।

हालांकि बीजेपी एक ही परिवार के दो सदस्यों को टिकट देने के खिलाफ है, लेकिन 2009 से बीजेपी मेनका और वरुण को लोकसभा चुनाव में मैदान में उतार रही है, वरुण गांधी को बीजेपी ने 2013 में और मेनका गांधी को 2014 में राष्ट्रीय महासचिव बनाया था.

वरुण गांधी को ये बातें बनाती हैं शक

यह अलग बात है कि मेनका अब मंत्री नहीं हैं. शायद उन्हें उम्मीद थी कि उनकी जगह वरुण को केंद्रीय मंत्रिमंडल में शामिल किया जाएगा, नहीं तो कम से कम पार्टी में ही उन्हें फिर से महासचिव नियुक्त किया जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। केंद्रीय मंत्रिमंडल में फेरबदल और विस्तार हुआ और पार्टी में कुछ नियुक्तियां भी हुईं, लेकिन वरुण गांधी का नंबर नहीं आया.

किसान आंदो लन पिछले 10 महीने से चल रहा है। अब तक चुप रहने के बाद वरुण गांधी का किसानों के समर्थन में बात करना और पत्र लिखना, जब उन्हें न तो सरकार में और न ही पार्टी में मौका मिला, वरुण गांधी को संदेह के घेरे में रखता है।

लोकसभा चुनाव का ड-र ?

वरुण गांधी शायद अब से अगले लोकसभा चुनाव की जीत को लेकर चिंतित हैं। पीलीभीत नेपाल और उत्तराखंड से अलग उत्तर प्रदेश का सीमावर्ती क्षेत्र है, जहां घने जंगल, जंग ली जा नवर हैं और वहां के अधिकांश लोग कृषि से जुड़े हैं। यह अवश्यंभावी है कि वरुण गांधी को लगता है कि अगर किसान आंदो लन और भी लंबा खिंचता है, तो इसका असर लोकसभा चुनाव पर पड़ सकता है।

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